संन्यासी आंदोलन (1769-60)

 

  बंगाल में अंग्रेजों का शासन साल 1757 में स्थापित हो चुका था। बंगाल में अंग्रेजों के शासन स्थापित होने के बाद औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का बोझ वहां की जनता के ऊपर बहुत तेजी से महसूस होने लगा। अंग्रेजों ने राज्य की प्रमुख आमदनी के स्रोत भू-राजस्व की दर बढ़ा दी। भू-राजस्व की वसूली बहुत कठोरता से करने लगे। शिल्पकारों, जमींदारों और किसानों की हालत बिगड़ने लगी। साल 1970 में बंगाल में अकाल पड़ा। अंग्रेजों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। करों की वसूली बदस्तूर और निर्मम तरीके से जारी रही। उस दौर मे बंगाल में वर्तमान पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे।

इसी समय में अंग्रेजो ने तीर्थस्थानों पर आने-जाने पर भी कर लगा दिया। हालांकि इस विद्रोह को संन्यासी विद्रोह का नाम दिया गया, लेकिन विलियम हंटर की माने तो इस विद्रोह की प्रमुख शक्ति बर्बाद हो चुके किसान थे। देशी राज्यों के बेकार हो चुके पूर्व सैनिक भी संन्यासियों के साथ मिलकर आंदोलन की भूमिका तैयार की।

 

स्थानीय ग्रामीणों ने इन आंदोलनकारियों जिन्हें उस दौर में विद्रोही कहा जाता था उन्हें पूरा समर्थन और शरण दी। इन लोगों ने अंग्रेजों की व्यापारिक कोठियों को निशाना बनाया। उनपर अनेक सफल हमलों को अंजाम दिया। पूर्णिया में 1770-71ई. में हुई एक लड़ाई में अंग्रेजों ने संन्यासी आंदोलनकारियों को पराजित करने और उनको बड़ी संख्या में कैद करने में सफलता पाई। मुर्शिदाबाद के रेवेन्यू बोर्ड के पास भेजे गए पत्रों से साफ पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर किसान ही हैं। अंग्रेजों के संगठित हमलों के बावजूद यह आंदोलन बढ़ता ही गया और उत्तरी बंगाल से अन्य इलाकों में भी फैलने लगा। कई अंग्रेज अधिकारियों ने अपने उच्च अधिकारियों को पत्रों के माध्यम से सूचना भेजी कि स्थानीय किसान आंदोलनकारियों को रसद का इंतजाम कर रहे हैं। साथ ही यह भी सूचना पहुंचाई गई कि लगान चुकाने से किसान इंकार करते हैं। 1773 ई. में आंदोलन का प्रमुख केंद्र रंगपुर था। अगले साल वह मैममनसिंह जिले को अपना केंद्र बना चुके थे।

इससे बाध्य होकर बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने ऐलान किया कि जो भी किसान आंदोलनकारियों की मदद करेंगे और अंग्रेज प्रशासन की मदद नहीं करेंगे उनको गुलाम बनाकर बाजार में बेच दिया जाएगा। भय उत्पन्न करने के लिए ‍विद्रोहियों को सार्वजनिक रूप से फांसी देने का तरीका अपनाया गया। इस आंदोलन में भवानी ठाकुर और देवी चौधरानी की प्रमुख भूमिका थी। अंग्रेजों ने एक लंबी और निर्मम कार्यवाई के बाद इस आंदोलन को दबाया। बंकिमचंद्र चटर्जी ने ही इस विद्रोह की पृष्ठभूमि पर ही अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ की रचना की है। हमारा राष्ट्रगीत वंदे मातरम भी इसी उपन्यास का एक हिस्सा है।

 

 

    

बुंदेला आंदोलन (1840)

 

 

1835 ई. में अंग्रेजों ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत नामक एक नया प्रान्त बनाया, जिसमें मराठों से छीने गए आधुनिक मध्यप्रदेश के दो जिले भी मिलाये गए-सागर एवं दमोह। इस प्रान्त में ‘बर्ड कमीशन' के प्रतिवेदन पर हुई दर पर कर लगा दिया गया। इससे यहां के जमींदार नाराज हुए और जब उनसे लगान कड़ाई से बसूलने का काम शुरू किया गया तो उन्होंने मधुकरशाह के नेतृत्व में 1842 ई. में विद्रोह कर उत्पात मचाना शुरू कर दिया। 1843 ई. तक इस विद्रोह पर काबू पा लिया गया और लगान भी कम कर दिया गया था।

बुंदेला विद्रोह की प्रथम चिंगारी ललितपुर जिले के छोटे से गांव नाराहट से निकली थी। नई राजस्व नीति के परिणाम स्वरूप यहाँ के जमींदार, जागीरदार और राजा-महाराजा तो शोषण के शिकार हो ही रहे थे, साथ ही इसका प्रभाव आम जनता पर पड़ रहा था । इस राजस्व नीति के तहत अनेक भू-स्वामियों की भूमि छीन ली गईं तथा अनेक भू-स्वामियों की जमीनें कुर्क कर ली गई । इसके अतिरिक्त अनेक जागीरदारों की जागीरें एवं अनेक राजाओं की रियासतें छीन ली जिससे बुन्देला वीरों का खून खौल उठा और देशभक्त बुन्देली वीर अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े हुए । विद्रोह व संघर्ष की शुरूआत नारहार के वीर बुन्देला मधुकर शाह तथा इनके भाई गणेश जू एवं चंद्रपुर के मालगुजार जवाहर सिंह द्वारा की गई । 8 अप्रैल 1842 को मधुकरशाह, गनेश जू तथा जवाहर सिंह ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया । इसी के साथ बुन्देलखण्ड में संघर्ष की लहर चारों ओर फैल गई । मधुकर शाह आदि ने मालथौन पर हमला करके उसे अपने कब्जे में ले लिया जिससे नाराज होकर अंग्रेज अधिकारी एम.सी. ओमेनी ने मधुकरशाह व गनेश जू के बूढ़े पिता राव विजय बहादुर सिंह को गिरफ्तार कर लिय तथा मधुकरशाह व गणेश की गिरफ्तारी हेतु उनके बगीचे में सैनिकों का पड़ाव डाल दिया जिस पर मधुकर शाह, गणेश जू, जवाहिर सिंह, विक्रमजीत सिंह, दीवान हीरासिंह, राजधर एवं क्षमाधर अग्निहोत्री आदि ने अंग्रेजी सेना पर हमला कर वहां से उन्हें मार भगाया जिसमें अनेक अंग्रेज सिपाही मारे गए । इसके बाद सभी क्रांतिकारी खिमलासा गए और वहां अंग्रेजों को परास्त कर मौत के घाट उतार कर लूटपाट की । तदुपरान्त सभी क्रांतिकारियों का दल बड़ा डोंगरा पहुंचा जिसमें क्षेत्र के अनेक लोग और शामिल हो गए । इस क्षेत्र में अंग्रेजों व अंग्रेजपरस्त लोगों की नींद हराम कर दी गई । इसी बीच 15 अप्रैल 1842 को क्षमाधर अग्निहोत्री व उनके साथियों की हत्या कर दी गई जिससे जन अक्रोश और भड़क गया। 30 अप्रैल 1842 को ओमिनी ने अपनी दमनकारी नीति के तहत् मधुकर शाह, गणेशजू, जवाहर सिंह आदि को बागी घोषित कराकर इनको जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर इनाम घोषित करा दिया । इसी बीच रमझरा में सभी क्रांतिकारी एकत्र हुए जिसमें ठाकुर इन्द्रजीत सिंह दतिया तथा राव विजय सिंह सहित लगभग दो सौ क्रांतिकारी इकट्ठे हुए । इसके बाद इसी दल में नारहार के तीन सौ लोग और शामिल हो गए । इस समय जवाहर सिंह चन्द्रपुर में उपस्थित थे । चन्द्रपुर से जवाहर सिंह का संदेश मिलने पर मधुकर शाह सभी साथियों सहित चन्द्रपुर की ओर बढ़े । वहाँ से मशालचियों को शामिल कर यह क्रांतिकारी टुकड़ी पथरिया होते हुए ईसुरवारा पहुंची वहां 7 मर्इ्र 1842 के बीना नदी के पास अंग्रेजों से इसकी मुठभेड़ हो गई । इसमे लगभग पचास क्रांतिकारी शहीद हुए तथा कुछ घायल हुए किन्तु मुखिया कोई नहीं पकड़े जा सके ।  इसके बाद कैप्टन मैकिन्टोस के नेतृत्व में नाराहर से 8 मील की दूरी पर गोना गांव अंग्रेज पहुंचे वह जिसे क्रांतिकारी ने लूट लिया था । तदुपरान्त लगातार क्रांतिकारी अंग्रेजी शासन को छकाते रहे फिर अंग्रेजी शासन ने एक नीति के तहत इन्हें हाजिर कराने की रणनीति बनाई जिसके तहत मधुकर शाह व गणेशजू के पिता राव विजय बहादुर सिंह को 25 मई 1842 को रिहा कर दिया । किन्तु इससे क्रांतिकारियों पर कोई असर नहीं पड़ा तथा वे अपनी गतिवधियों में लगातार संलग्न रहे जिसके  परिणाम स्वरूप 19 जून 1842 को अंग्रेज अफसर मेकिनटोस के नेतृत्व वाली फिरंगी सेना से पंचमनगर में मुठभेड़ हो गई जिसमें कई अंग्रेज सैनिक मारे गऐ तथा 15-20 क्रांतिकारी भी शहीद हुए ।

    क्रांतिकारी लगातार संघर्ष करते रहे उन्होंने जून 1842 में चन्द्रपुर तथा खुरई पर आक्रमण किया क्योंकि ये अंग्रेजी सत्ता के केन्द्र थे । ग्राम देवरी में जवाहर सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों पर हमला किया गया जिसमें कई अंग्रेज सैनिक मारे गऐ । बेसरा गाँव के थाने में क्रांतिकारियों ने आग लगादी । 16 जुलाई 1842 को इन्हीं क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के अभेद्य दुर्ग धामौनी पर हमला कर उसे जीत लिया जिसमें 5 अरबी घोड़े, 7780 रुपये तथा काफी अस्त्र शस्त्र क्रांतिकारियों को मिले । इसी के बाद शाहगढ़ के राजा बखतवली शाह तथा वानपुर के राजा मर्दन सिंह भी इन क्रांतिकारियों के साथ हो लिए । उनको जैतपुर के अपदस्थ राजा पारीछत का भी खुला सहयोग मिल रहा था । ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध बुन्देलाओं के विद्रोह के समय ही हीरापुर के लोधी राजा हिरदेशाह ने भी अंग्रेजों की खिलाफत करने हेतु बहरौल में मलखान सिंह मुखिया के नेतृत्व में बैठक बुलाकर निर्णय लिया कि वे ब्रिटिश हुकूमत की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध करेंगे । इस बैठक में करीब ढाई-तीन सौ क्रांतिकारी शामिल हुए थे । बैठक में मदनपुर के गौंड़ राजा डेलनशाह दिलावर के गौड़ मालगुजार दिलावर सिंह और नरबर सिंह भी शामिल थे । इस बैठक की खबर अंग्रेजों को लगी तो लेफ्टिनेंट हरबर्ट तथा लेफ्टीनेंस राइकेश के नेतृत्व में बहरौल में अंग्रेज दाखिल हुए । इस लड़ाई में 15 क्रांतिकारी शहीद हुए । इन क्रांतिकारियों ने सक्रिय होकर सागर तथा नरसिंहपुर जिले में अनेक स्थलों पर अपनी सजा कायम की । इन्होंने महाराजपुर तथा सुआतला पर अपना कब्जा जमा लिया । सुआतल के बुन्देला ठाकुर रन्जोर सिंह भी क्रांतिकारियों से मिल गए । क्रांतिकारियों ने नर्मदा के घाटों पर अपनी सैनिक टुकड़ियां तैनात कर दी तथा अनेक स्थानों को अंग्रेजों से छीनकर अपने पटवारी तथा नाजिर नियुक्त कर दिय । नर्मदा घाटों पर कब्जा के बाद तेंदूखेड़ा पर क्रांतिकारियों ने बिना संघर्ष के अपना अधिकार कर लिया । इन्हीं क्रांतिकारियों ने होशंगाबाद जिले के दिलवार पर भी कब्ज जमा लिया । इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिये थे जिससे जनरल टॉमस ने कार्नल वॉटसन को तेजगढ़ को भेजा वहां अनेक अंग्रेज सिपाही मारे गए तथा क्रांतिकारियों ने तेजगढ़, अभाना तथा बालाकोट स्थानों पर आधिपत्य जमा लिया । इस तरह इन स्वतंत्रता के दीवानों ने नरसिंहपुर, जबलपुर, दमोह तथा नर्मदा पार के बड़े भू-भाग पर अपना कब्जा जमाकर उसे अंग्रेजी भय से मुक्त करा दिया । अब अंग्रेजों ने आमने सामने न लड़कर कूटनीति का सहारा लेकर जबलपुर जिले में हर 10 मील पर निगरानी केन्द्र खोले गये तथा सीमावर्ती जिलों में पुलिस बल बढ़ाया गया । ब्राउन ने हीरापुर के पास ग्राम सांकल में 42 मद्रास रेजीमेंट की दो टुकड़ियां तैनात की जिससे हिरदेशाह पर कड़ी निगरानी रखी गई । राजा हिरदेशाह जब तेजगढ़ पहुंचे तो उनकी मुठभेड़ अंग्रेज सैनिकों से हो गई जिससे अनेक क्रांतिकारी शहीद हुए । दिसम्बर 1842 तक लगातार क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रहीं अंग्रजों ने इन क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी पर इनाम बढ़ा दी । लेकिन सभी क्रांतिकारी अपने अपने इलाकों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे कि फरवरी 1843 में मधुकर शाह अस्वस्थ हो गए । जिससे वे अपना इलाज नाराहर में घर पर करा रहे थे । इसकी खबर जैसे ही कैप्टन हैमिल्टन को मिली उसने बीमार हालत में ही मधुकर शाह को घर से गिरफ्तार करना उचित समझा तथा नाराहर आकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया । यह खबर पाकर राजा हिरदेशाह जैतपुर से सागर के लिए रवाना हुए वे वहाँ पहुंचते इसके पहले ही मधुकरशाह को सागर में अंग्रेजों ने फाँसी दे दी । राजा हिरदेशाह को सागर जाते समय शाहगढ़ के समीप गिरफ्तार कर लिया गया । उनके साथ मेहरबार सिंह ईसरी सिंह, राव अमान सिंह सहित अनेक क्रांतिकारी पकड़े गए । मधुकर शाह की फांसी से तथा हिरदेशाह की गिरफ्तारी से क्रांति असफल हो गए किन्तु बुन्देलखण्ड ने इन वीरों ने आजादी की अलख जगाते हुए अंग्रेजों से लड़ने का हौसला दिया तथा सैकड़ों वीर शहीद हुए ।

 

इस प्रकार सागर, दमोह, नरसिंहपुर से लेकर जबलपुर, मंडला और होशंगाबाद के सारे क्षेत्र में विद्रोह की आग भड़की, लेकिन आपसी सामंजस्य और तालमेल के अभाव में अंग्रेज इन्हें दबाने में सफल हो गए।

 

संथाल आंदोलन (1855)

वर्ष 1855 में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमींदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय-अत्याचार की शिकार संथाल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में 'हूल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विद्रोह' होता है। यह अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु-कान्हू, चाँद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संथाल हुल का नेतृत्व किया।

 

जब ब्रिटिश लोग पहाड़िया जनजाति को अपने बस में करके स्थायी कॄषि के लिए एक स्थान पर बसाने में असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया। पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे और अब भी उपद्रवी व्यवहार करते थे। जबकि, इसके विपरीत, संथाल आदर्श बाशिंदे प्रतीत हुए, क्योंकि उन्हें जंगलों का सफ़ाया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि को पूरी ताकत लगाकर जोतते थे। संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे। जमींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए उन्हें भाड़े पर रखते थे और ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महालों में बसने का निमंत्रण दिया।

 

संथालों को जमीनें देकर राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया। 1832 तक, जमीन के एक काफ़ी बड़े इलाको को दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया। इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया गया। उन्हें इस इलाके के भीतर रहना था, हल चलाकर खेती करनी थी और स्थायी किसान बनना था। संथालों को दी जाने वाली भूमि के अनुदान-पत्र में यह शर्त थी कि उनको दी गई भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को साफ़ करके पहले दस वर्षों के भीतर जोतना था। इस पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण करके उसका नक्शा तैयार किया गया। इसके चारों ओर खंबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित कर दी गई और इसे मैदानी इलाके के स्थायी कॄषकों की दुनिया से और पहाड़िया जनजाति लोगों की पहाड़ियों से अलग कर दिया गया।

 

दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद संथालों की बस्तियाँ बड़ी तेजी से बढ़ीं, संथालों के गाँवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुँच गई। इसी काल में, संथालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। जैसे-जैसे खेती का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे कंपनी की तिजोरियों में राजस्व राशि में वृद्धि होती गई। उन्नीसवीं शताब्दी के संथाल गीतों और मिथकों में उनकी यात्रा के लंबे इतिहास का बार-बार उल्लेख किया गया है: उनमें कहा गया है कि संथाल लोग अपने लिए बसने योग्य स्थान की खोज में बराबर बिना थके चलते ही रहते थे। अब यहाँ दामिन-इ-कोह में आकर मानो उनकी इस यात्रा को पूर्ण विराम लग गया।

 

जब संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसे तो पहले पहाड़िया लोगों ने इसका प्रतिरो्ध किया पर अंततोगत्वा वे इन पहाड़ियों में भीतर की ओर चले जाने के लिए मजबूर कर दिए गए। उन्हें निचली पहाड़ियों तथा घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया और ऊ…परी पहाड़ियों के चट्टानी और अधिक बंजर इलाकों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित कर दिया गया। इससे उनके रहन-सहन तथा जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा और आगे चलकर वे गरीब हो गए। झूम खेती नयी-से-नयी जमीनें खोजने और भूमि की प्राकॄतिक उर्वरता का उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर रहती है। अब सर्वाधिक उर्वर जमीनें उनके लिए दुर्लभ हो गईं क्योंकि वे अब दामिन का हिस्सा बन चुकी थीं। इसलिए पहाड़िया लोग खेती के अपने तरीके झूम खेती को आगे सफलतापूर्वक नहीं चला सके। जब इस क्षेत्र के जंगल खेती के लिए साफ़ कर दिए गए तो पहाड़िया शिकारियों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

इसके विपरीत संथाल लोगों ने अपनी पहले वाली खानबदोश ज़िंदगी को छोड़ दिया था। अब वे एक जगह बस गए थे और बाजार के लिए कई तरह के वाणिज्यिक फ़सलों की खेती करने लगे थे और व्यापारियों तथा साहूकारों के साथ लेन-देन करने लगे थे। किंतु, संथालों ने भी जल्दी ही यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरू की थी वह उनके हाथों से निकलती जा रही है। संथालों ने जिस जमीन को साफ़ करके खेती शुरू की थी उस पर सरकार ;राज्य भारी कर लगा रही थी, साहूकार, दिकू लोग बहुत ऊंची दर पर ब्याज लगा रहे थे और कर्ज अदा न किए जाने की सूरत में जमीन पर ही कब्जा कर रहे थे और जमींदार लोग दामिन इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।

भ्रष्टाचार और अत्याचार के उपकरणों से लैस औपनिवेशिक  शासन से संथालों में असंतोष बढ़ने लगा। 1850 के दशक तक, संथाल लोग यह महसूस करने लगे थे कि अपने लिए एक आदर्श संसार का निर्माण करने के लिए, जहाँ उनका अपना शासन हो, जमींदारों, साहूकारों और औपनिवेशिक राज के विरुद्ध विद्रोह करने का समय अब आ गया है। 1854 तक संथाल पूरी तरह संगठित हो चुके थे। संथालों ने अपनी बैठकें करके खुले विद्रोह की तैयारी की/ जमींदारों और सूदखोरों को लूटने की छिटपुट घटनाओं से विद्रोह शुरू हुआ। 30 जून 1855 को भगनीडीह में 400 गांवों के करीब 6 हजार संथाल  एकत्र हुए और सभी की। विदेशियों  राज हमेशा के लिये खत्म करने और न्याय का राज स्थापित करने के लिये खुला विद्रोह करने का फैसला किया गया। विद्रोह जब अपने पूरे चरम पर था तो करीब 60 हजार संथाल उससे जुड़े हुए थे। संथालों ने पुलिस स्टेशनों, डाक ढोने वाली गाड़ियों, स्थानीय जमींदारों, महाजनों और अंग्रेजों को निशाना बनाना शुरू किया। अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए सेना का सहारा लिया और क्रूरतापूर्वक दमन किया। करीब 15,000 से ज्यादा संथाल मारे गए। अगस्त 1855 में सीदो को पकड़कर मार डाला गया। कान्हू को 1856 में पकड़ा गया।

1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण कर दिया गया, जिसके लिए 5,500 वर्गमील का क्षेत्र भागलपुर और बीरभूम जिलों में से लिया गया। औपनिवेशिक राज को आशा थी कि संथालों के लिए नया परगना बनाने और उसमें कुछ विशेष कानून लागू करने से संथाल लोग संतुष्ट हो जाएँगे।

 

नील आंदोलन (1859-60)

 

किसानों ने अपनी मांगों के लिए औपनिवेशिक  शासन से सबसे पहले अहिंसक संघर्ष के माध्यम से जिस लड़ाई में सबसे पहले जीत हासिल की वह बंगाल का नील आंदोलन था।

यह आन्दोलन भारतीयों किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के ख़िलाफ़ बंगाल में किया गया। अपनी आर्थिक माँगों के सन्दर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आन्दोलन उस समय का एक विशाल आन्दोलन था। अंग्रेज़ अधिकारी बंगाल तथा बिहार के ज़मींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिये ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश करते थे। इसके अलावा नील उत्पादक किसानों को एक मामूली सी रक़म अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थे, जो बाज़ार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को 'ददनी प्रथा' कहा जाता था, जबकि किसान अपनी उपजाऊ ज़मीन पर चावल की खेती करना चाहते थे। बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने खुद इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि सारे झगड़े की जड़ यह है कि नील उत्पादक बिना पैसे दिए ही किसानों को नील की खेती करने पर मजबूर करते हैं। लेकिन नील उत्पादकों ने किसानों से कोई भी अग्रिम करार करना बंद कर दिया और उनको आतंकित करने का तरीका अपनाया। सभी नील उत्पादक यूरोपीय और उनको कानून का कोई भी भय नहीं था क्योंकि अंग्रेज न्यायाधीश उनके प्रति नरम रवैया अपनाते थे। अगर किसी न्यायाधीश ने इंसाफ करने का प्रयास किया तो चेतावनी के साथ उसका तबादला कर दिया जाता था। न्यायपालिका का हाल तो यह था कि 1857 में 29 नील उत्पादकों और एक जमींदार को ही ऑनरेरी मजिस्ट्रेट  नियुक्त किया गया था।

किसानों के असंतोष को हवा तब मिली जब 17 अगस्त 1859 को एक डिप्टी मजिस्ट्रेट हेम चंद्राकर ने पुलिस के नाम एक फरमान जारी कर दिया कि नील उगाने वाले किसानों से जुड़े किसी भी मामले में जमीन पर किसान का कब्जा कायम रहेगा और वह अपनी पसंद की   फसल उगा सकेगा। पुलिस की यह जिम्मेदारी है कि वह किसी भी नील उत्पादक या अन्य लोगों को उसमें हस्तक्षेप नहीं करने दे। किसानों को इससे बहुत बल मिला और उन्होंने इस बारे में शांतिपूर्ण आंदोलन तेज कर दिया।   

इस आन्दोलन की सर्वप्रथम शुरुआत सितम्बर, 1859 ई. में बंगाल के 'नदिया ज़िले' के गोविन्दपुर गाँव से हुई। इस आन्दोलन की शुरुआत दिगम्बर एवं विष्णु विश्वास नामक दो भाइयों  ने की थी। भारतीय किसानों ने अंग्रेज़ों द्वारा अपने साथ दासों जैसा व्यवहार करने के कारण ही विद्रोह किया। यह आन्दोलन 'नदिया', 'पाबना', 'खुलना', 'ढाका', 'मालदा', 'दीनाजपुर' आदि स्थानों पर फैला था। किसानों की आपसी एकजुटता, अनुशासन एवं संगठित होने के बदौलत ही आन्दोलन पूर्णरूप से सफल रहा। इसकी सफलता के सामने अंग्रेज़ सरकार को झुकना पड़ा और रैय्यतों की स्वतन्त्रता को ध्यान में रखते हुए  अधिसूचना  जारी करना पड़ा कि किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।  1860 ई. के नील विद्रोह का वर्णन 'दीनबन्धु मित्र' ने अपनी पुस्तक 'नील दर्पण' में किया है। हिन्दू पैट्रियट' के संपादक 'हरीशचन्द्र मुखर्जी' ने नील आन्दोलन में काफ़ी काम किया। किसानों के शोषण, सरकारी अधिकारियों के पक्षपात ओर इसके विरुद्ध विभिन्न स्थानों पर चल रहे किसानों के संघर्ष में उन्होंने अख़बार में लगातार ख़बरें छापीं। मिशनरियों ने भी नील आन्दोलन के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभाई। इस आन्दोलन के प्रति सरकार का भी रवैया काफ़ी संतुलित रहा। 1860 ई. तक बंगाल से नील की खेती पूरी तरह ख़त्म हो गई। अब नीलहों ने बिहार के कुछ जिलों को अपना प्रमुख केंद्र बना लिया। जिसका विरोध आगे चलकर महात्मा गांधी को चंपारण आंदोलन के माध्यम से करना पड़ा

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संन्यासी आंदोलन (1769-60)

बंगाल में अंग्रेजों का शासन साल 1757 में स्थापित हो चुका था। बंगाल में अंग्रेजों के शासन स्थापित होने के बाद औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का बोझ वहां की जनता के ऊपर बहुत तेजी से महसूस होने लगा। अंग्रेजों ने राज्य की प्रमुख आमदनी के स्रोत भू-राजस्व की दर बढ़ा दी। भू-राजस्व की वसूली बहुत कठोरता से करने लगे। शिल्पकारों, जमींदारों और किसानों की हालत बिगड़ने लगी। साल 1970 में बंगाल में अकाल पड़ा। अंग्रेजों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

                                                                                                           करों की वसूली बदस्तूर और निर्मम तरीके से जारी रही। उस दौर मे बंगाल में वर्तमान पश्चिम बंगाल,  बांग्लादेश, बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे।इसी समय में अंग्रेजो ने तीर्थस्थानों पर आने-जाने पर भी कर लगा दिया। हालांकि इस विद्रोह को संन्यासी विद्रोह का नाम दिया गया, लेकिन विलियम हंटर की माने तो इस विद्रोह की प्रमुख शक्ति बर्बाद हो चुके किसान थे। देशी राज्यों के बेकार हो चुके पूर्व सैनिक भी संन्यासियों के साथ मिलकर आंदोलन की भूमिका तैयार की।

 

स्थानीय ग्रामीणों ने इन आंदोलनकारियों जिन्हें उस दौर में विद्रोही कहा जाता था उन्हें पूरा समर्थन और शरण दी। इन लोगों ने अंग्रेजों की व्यापारिक कोठियों को निशाना बनाया। उनपर अनेक सफल हमलों को अंजाम दिया। पूर्णिया में 1770-71ई. में हुई एक लड़ाई में अंग्रेजों ने संन्यासी आंदोलनकारियों को पराजित करने और उनको बड़ी संख्या में कैद करने में सफलता पाई। मुर्शिदाबाद के रेवेन्यू बोर्ड के पास भेजे गए पत्रों से साफ पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर किसान ही हैं। अंग्रेजों के संगठित हमलों के बावजूद यह आंदोलन बढ़ता ही गया और उत्तरी बंगाल से अन्य इलाकों में भी फैलने लगा। कई अंग्रेज अधिकारियों ने अपने उच्च अधिकारियों को पत्रों के माध्यम से सूचना भेजी कि स्थानीय किसान आंदोलनकारियों को रसद का इंतजाम कर रहे हैं। साथ ही यह भी सूचना पहुंचाई गई कि लगान चुकाने से किसान इंकार करते हैं। 1773 ई. में आंदोलन का प्रमुख केंद्र रंगपुर था। अगले साल वह मैममनसिंह जिले को अपना केंद्र बना चुके थे।

इससे बाध्य होकर बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने ऐलान किया कि जो भी किसान आंदोलनकारियों की मदद करेंगे और अंग्रेज प्रशासन की मदद नहीं करेंगे उनको गुलाम बनाकर बाजार में बेच दिया जाएगा। भय उत्पन्न करने के लिए ‍विद्रोहियों को सार्वजनिक रूप से फांसी देने का तरीका अपनाया गया। इस आंदोलन में भवानी ठाकुर और देवी चौधरानी की प्रमुख भूमिका थी। अंग्रेजों ने एक लंबी और निर्मम कार्यवाई के बाद इस आंदोलन को दबाया। बंकिमचंद्र चटर्जी ने ही इस विद्रोह की पृष्ठभूमि पर ही अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ की रचना की है। हमारा राष्ट्रगीत वंदे मातरम भी इसी उपन्यास का एक हिस्सा है।

 

 

    

बुंदेला आंदोलन (1840)

 

1835 ई. में अंग्रेजों ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत नामक एक नया प्रान्त बनाया, जिसमें मराठों से छीने गए आधुनिक मध्यप्रदेश के दो जिले भी मिलाये गए-सागर एवं दमोह। इस प्रान्त में ‘बर्ड कमीशन' के प्रतिवेदन पर हुई दर पर कर लगा दिया गया। इससे यहां के जमींदार नाराज हुए और जब उनसे लगान कड़ाई से बसूलने का काम शुरू किया गया तो उन्होंने मधुकरशाह के नेतृत्व में 1842 ई. में विद्रोह कर उत्पात मचाना शुरू कर दिया। 1843 ई. तक इस विद्रोह पर काबू पा लिया गया और लगान भी कम कर दिया गया था।

बुंदेला विद्रोह की प्रथम चिंगारी ललितपुर जिले के छोटे से गांव नाराहट से निकली थी। नई राजस्व नीति के परिणाम स्वरूप यहाँ के जमींदार, जागीरदार और राजा-महाराजा तो शोषण के शिकार हो ही रहे थे, साथ ही इसका प्रभाव आम जनता पर पड़ रहा था । इस राजस्व नीति के तहत अनेक भू-स्वामियों की भूमि छीन ली गईं तथा अनेक भू-स्वामियों की जमीनें कुर्क कर ली गई । इसके अतिरिक्त अनेक जागीरदारों की जागीरें एवं अनेक राजाओं की रियासतें छीन ली जिससे बुन्देला वीरों का खून खौल उठा और देशभक्त बुन्देली वीर अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े हुए । विद्रोह व संघर्ष की शुरूआत नारहार के वीर बुन्देला मधुकर शाह तथा इनके भाई गणेश जू एवं चंद्रपुर के मालगुजार जवाहर सिंह द्वारा की गई । 8 अप्रैल 1842 को मधुकरशाह, गनेश जू तथा जवाहर सिंह ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया । इसी के साथ बुन्देलखण्ड में संघर्ष की लहर चारों ओर फैल गई । मधुकर शाह आदि ने मालथौन पर हमला करके उसे अपने कब्जे में ले लिया जिससे नाराज होकर अंग्रेज अधिकारी एम.सी. ओमेनी ने मधुकरशाह व गनेश जू के बूढ़े पिता राव विजय बहादुर सिंह को गिरफ्तार कर लिय तथा मधुकरशाह व गणेश की गिरफ्तारी हेतु उनके बगीचे में सैनिकों का पड़ाव डाल दिया जिस पर मधुकर शाह, गणेश जू, जवाहिर सिंह, विक्रमजीत सिंह, दीवान हीरासिंह, राजधर एवं क्षमाधर अग्निहोत्री आदि ने अंग्रेजी सेना पर हमला कर वहां से उन्हें मार भगाया जिसमें अनेक अंग्रेज सिपाही मारे गए । इसके बाद सभी क्रांतिकारी खिमलासा गए और वहां अंग्रेजों को परास्त कर मौत के घाट उतार कर लूटपाट की । तदुपरान्त सभी क्रांतिकारियों का दल बड़ा डोंगरा पहुंचा जिसमें क्षेत्र के अनेक लोग और शामिल हो गए । इस क्षेत्र में अंग्रेजों व अंग्रेजपरस्त लोगों की नींद हराम कर दी गई । इसी बीच 15 अप्रैल 1842 को क्षमाधर अग्निहोत्री व उनके साथियों की हत्या कर दी गई जिससे जन अक्रोश और भड़क गया। 30 अप्रैल 1842 को ओमिनी ने अपनी दमनकारी नीति के तहत् मधुकर शाह, गणेशजू, जवाहर सिंह आदि को बागी घोषित कराकर इनको जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर इनाम घोषित करा दिया । इसी बीच रमझरा में सभी क्रांतिकारी एकत्र हुए जिसमें ठाकुर इन्द्रजीत सिंह दतिया तथा राव विजय सिंह सहित लगभग दो सौ क्रांतिकारी इकट्ठे हुए । इसके बाद इसी दल में नारहार के तीन सौ लोग और शामिल हो गए । इस समय जवाहर सिंह चन्द्रपुर में उपस्थित थे । चन्द्रपुर से जवाहर सिंह का संदेश मिलने पर मधुकर शाह सभी साथियों सहित चन्द्रपुर की ओर बढ़े । वहाँ से मशालचियों को शामिल कर यह क्रांतिकारी टुकड़ी पथरिया होते हुए ईसुरवारा पहुंची वहां 7 मर्इ्र 1842 के बीना नदी के पास अंग्रेजों से इसकी मुठभेड़ हो गई । इसमे लगभग पचास क्रांतिकारी शहीद हुए तथा कुछ घायल हुए किन्तु मुखिया कोई नहीं पकड़े जा सके । 

 कैप्टन मैकिन्टोस के नेतृत्व में नाराहर से 8 मील की दूरी पर गोना गांव अंग्रेज पहुंचे वह जिसे क्रांतिकारी ने लूट लिया था । तदुपरान्त लगातार क्रांतिकारी अंग्रेजी शासन को छकाते रहे फिर अंग्रेजी शासन ने एक नीति के तहत इन्हें हाजिर कराने की रणनीति बनाई जिसके तहत मधुकर शाह व गणेशजू के पिता राव विजय बहादुर सिंह को 25 मई 1842 को रिहा कर दिया । किन्तु इससे क्रांतिकारियों पर कोई असर नहीं पड़ा तथा वे अपनी गतिवधियों में लगातार संलग्न रहे जिसके  परिणाम स्वरूप 19 जून 1842 को अंग्रेज अफसर मेकिनटोस के नेतृत्व वाली फिरंगी सेना से पंचमनगर में मुठभेड़ हो गई जिसमें कई अंग्रेज सैनिक मारे गऐ तथा 15-20 क्रांतिकारी भी शहीद हुए

    क्रांतिकारी लगातार संघर्ष करते रहे उन्होंने जून 1842 में चन्द्रपुर तथा खुरई पर आक्रमण किया क्योंकि ये अंग्रेजी सत्ता के केन्द्र थे । ग्राम देवरी में जवाहर सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों पर हमला किया गया जिसमें कई अंग्रेज सैनिक मारे गऐ । बेसरा गाँव के थाने में क्रांतिकारियों ने आग लगादी । 16 जुलाई 1842 को इन्हीं क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के अभेद्य दुर्ग धामौनी पर हमला कर उसे जीत लिया जिसमें 5 अरबी घोड़े, 7780 रुपये तथा काफी अस्त्र शस्त्र क्रांतिकारियों को मिले । इसी के बाद शाहगढ़ के राजा बखतवली शाह तथा वानपुर के राजा मर्दन सिंह भी इन क्रांतिकारियों के साथ हो लिए । उनको जैतपुर के अपदस्थ राजा पारीछत का भी खुला सहयोग मिल रहा था । ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध बुन्देलाओं के विद्रोह के समय ही हीरापुर के लोधी राजा हिरदेशाह ने भी अंग्रेजों की खिलाफत करने हेतु बहरौल में मलखान सिंह मुखिया के नेतृत्व में बैठक बुलाकर निर्णय लिया कि वे ब्रिटिश हुकूमत की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध करेंगे । इस बैठक में करीब ढाई-तीन सौ क्रांतिकारी शामिल हुए थे । बैठक में मदनपुर के गौंड़ राजा डेलनशाह दिलावर के गौड़ मालगुजार दिलावर सिंह और नरबर सिंह भी शामिल थे । इस बैठक की खबर अंग्रेजों को लगी तो लेफ्टिनेंट हरबर्ट तथा लेफ्टीनेंस राइकेश के नेतृत्व में बहरौल में अंग्रेज दाखिल हुए । इस लड़ाई में 15 क्रांतिकारी शहीद हुए । इन क्रांतिकारियों ने सक्रिय होकर सागर तथा नरसिंहपुर जिले में अनेक स्थलों पर अपनी सजा कायम की । इन्होंने महाराजपुर तथा सुआतला पर अपना कब्जा जमा लिया । सुआतल के बुन्देला ठाकुर रन्जोर सिंह भी क्रांतिकारियों से मिल गए । क्रांतिकारियों ने नर्मदा के घाटों पर अपनी सैनिक टुकड़ियां तैनात कर दी तथा अनेक स्थानों को अंग्रेजों से छीनकर अपने पटवारी तथा नाजिर नियुक्त कर दिय । नर्मदा घाटों पर कब्जा के बाद तेंदूखेड़ा पर क्रांतिकारियों ने बिना संघर्ष के अपना अधिकार कर लिया । इन्हीं क्रांतिकारियों ने होशंगाबाद जिले के दिलवार पर भी कब्ज जमा लिया । इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिये थे जिससे जनरल टॉमस ने कार्नल वॉटसन को तेजगढ़ को भेजा वहां अनेक अंग्रेज सिपाही मारे गए तथा क्रांतिकारियों ने तेजगढ़, अभाना तथा बालाकोट स्थानों पर आधिपत्य जमा लिया । इस तरह इन स्वतंत्रता के दीवानों ने नरसिंहपुर, जबलपुर, दमोह तथा नर्मदा पार के बड़े भू-भाग पर अपना कब्जा जमाकर उसे अंग्रेजी भय से मुक्त करा दिया । अब अंग्रेजों ने आमने सामने न लड़कर कूटनीति का सहारा लेकर जबलपुर जिले में हर 10 मील पर निगरानी केन्द्र खोले गये तथा सीमावर्ती जिलों में पुलिस बल बढ़ाया गया । ब्राउन ने हीरापुर के पास ग्राम सांकल में 42 मद्रास रेजीमेंट की दो टुकड़ियां तैनात की जिससे हिरदेशाह पर कड़ी निगरानी रखी गई । राजा हिरदेशाह जब तेजगढ़ पहुंचे तो उनकी मुठभेड़ अंग्रेज सैनिकों से हो गई जिससे अनेक क्रांतिकारी शहीद हुए । दिसम्बर 1842 तक लगातार क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रहीं अंग्रजों ने इन क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी पर इनाम बढ़ा दी । लेकिन सभी क्रांतिकारी अपने अपने इलाकों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे कि फरवरी 1843 में मधुकर शाह अस्वस्थ हो गए । जिससे वे अपना इलाज नाराहर में घर पर करा रहे थे । इसकी खबर जैसे ही कैप्टन हैमिल्टन को मिली उसने बीमार हालत में ही मधुकर शाह को घर से गिरफ्तार करना उचित समझा तथा नाराहर आकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया । यह खबर पाकर राजा हिरदेशाह जैतपुर से सागर के लिए रवाना हुए वे वहाँ पहुंचते इसके पहले ही मधुकरशाह को सागर में अंग्रेजों ने फाँसी दे दी । राजा हिरदेशाह को सागर जाते समय शाहगढ़ के समीप गिरफ्तार कर लिया गया । उनके साथ मेहरबार सिंह ईसरी सिंह, राव अमान सिंह सहित अनेक क्रांतिकारी पकड़े गए । मधुकर शाह की फांसी से तथा हिरदेशाह की गिरफ्तारी से क्रांति असफल हो गए किन्तु बुन्देलखण्ड ने इन वीरों ने आजादी की अलख जगाते हुए अंग्रेजों से लड़ने का हौसला दिया तथा सैकड़ों वीर शहीद हुए ।इस प्रकार सागर, दमोह, नरसिंहपुर से लेकर जबलपुर, मंडला और होशंगाबाद के सारे क्षेत्र में विद्रोह की आग भड़की, लेकिन आपसी सामंजस्य और तालमेल के अभाव में अंग्रेज इन्हें दबाने में सफल हो गए।

 

संथाल आंदोलन (1855)

वर्ष 1855 में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमींदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय-अत्याचार की शिकार संथाल जनता ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में 'हूल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'विद्रोह' होता है। यह अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु-कान्हू, चाँद-भैरो भाइयों और फूलो-झानो जुड़वा बहनों ने संथाल हुल का नेतृत्व किया।

 

जब ब्रिटिश लोग पहाड़िया जनजाति को अपने बस में करके स्थायी कॄषि के लिए एक स्थान पर बसाने में असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया। पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे और अब भी उपद्रवी व्यवहार करते थे। जबकि, इसके विपरीत, संथाल आदर्श बाशिंदे प्रतीत हुए, क्योंकि उन्हें जंगलों का सफ़ाया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि को पूरी ताकत लगाकर जोतते थे। संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे। जमींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए उन्हें भाड़े पर रखते थे और ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महालों में बसने का निमंत्रण दिया।

 

संथालों को जमीनें देकर राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया। 1832 तक, जमीन के एक काफ़ी बड़े इलाको को दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया। इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया गया। उन्हें इस इलाके के भीतर रहना था, हल चलाकर खेती करनी थी और स्थायी किसान बनना था। संथालों को दी जाने वाली भूमि के अनुदान-पत्र में यह शर्त थी कि उनको दी गई भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को साफ़ करके पहले दस वर्षों के भीतर जोतना था। इस पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण करके उसका नक्शा तैयार किया गया। इसके चारों ओर खंबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित कर दी गई और इसे मैदानी इलाके के स्थायी कॄषकों की दुनिया से और पहाड़िया जनजाति लोगों की पहाड़ियों से अलग कर दिया गया।

 

दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद संथालों की बस्तियाँ बड़ी तेजी से बढ़ीं, संथालों के गाँवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुँच गई। इसी काल में, संथालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। जैसे-जैसे खेती का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे कंपनी की तिजोरियों में राजस्व राशि में वृद्धि होती गई। उन्नीसवीं शताब्दी के संथाल गीतों और मिथकों में उनकी यात्रा के लंबे इतिहास का बार-बार उल्लेख किया गया है: उनमें कहा गया है कि संथाल लोग अपने लिए बसने योग्य स्थान की खोज में बराबर बिना थके चलते ही रहते थे। अब यहाँ दामिन-इ-कोह में आकर मानो उनकी इस यात्रा को पूर्ण विराम लग गया।

 

जब संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसे तो पहले पहाड़िया लोगों ने इसका प्रतिरो्ध किया पर अंततोगत्वा वे इन पहाड़ियों में भीतर की ओर चले जाने के लिए मजबूर कर दिए गए। उन्हें निचली पहाड़ियों तथा घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया और ऊ…परी पहाड़ियों के चट्टानी और अधिक बंजर इलाकों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित कर दिया गया। इससे उनके रहन-सहन तथा जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा और आगे चलकर वे गरीब हो गए। झूम खेती नयी-से-नयी जमीनें खोजने और भूमि की प्राकॄतिक उर्वरता का उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर रहती है। अब सर्वाधिक उर्वर जमीनें उनके लिए दुर्लभ हो गईं क्योंकि वे अब दामिन का हिस्सा बन चुकी थीं। इसलिए पहाड़िया लोग खेती के अपने तरीके झूम खेती को आगे सफलतापूर्वक नहीं चला सके। जब इस क्षेत्र के जंगल खेती के लिए साफ़ कर दिए गए तो पहाड़िया शिकारियों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

इसके विपरीत संथाल लोगों ने अपनी पहले वाली खानबदोश ज़िंदगी को छोड़ दिया था। अब वे एक जगह बस गए थे और बाजार के लिए कई तरह के वाणिज्यिक फ़सलों की खेती करने लगे थे और व्यापारियों तथा साहूकारों के साथ लेन-देन करने लगे थे। किंतु, संथालों ने भी जल्दी ही यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरू की थी वह उनके हाथों से निकलती जा रही है। संथालों ने जिस जमीन को साफ़ करके खेती शुरू की थी उस पर सरकार ;राज्य भारी कर लगा रही थी, साहूकार, दिकू लोग बहुत ऊंची दर पर ब्याज लगा रहे थे और कर्ज अदा न किए जाने की सूरत में जमीन पर ही कब्जा कर रहे थे और जमींदार लोग दामिन इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।

भ्रष्टाचार और अत्याचार के उपकरणों से लैस औपनिवेशिक  शासन से संथालों में असंतोष बढ़ने लगा। 1850 के दशक तक, संथाल लोग यह महसूस करने लगे थे कि अपने लिए एक आदर्श संसार का निर्माण करने के लिए, जहाँ उनका अपना शासन हो, जमींदारों, साहूकारों और औपनिवेशिक राज के विरुद्ध विद्रोह करने का समय अब आ गया है। 1854 तक संथाल पूरी तरह संगठित हो चुके थे। संथालों ने अपनी बैठकें करके खुले विद्रोह की तैयारी की/ जमींदारों और सूदखोरों को लूटने की छिटपुट घटनाओं से विद्रोह शुरू हुआ। 30 जून 1855 को भगनीडीह में 400 गांवों के करीब 6 हजार संथाल  एकत्र हुए और सभी की। विदेशियों  राज हमेशा के लिये खत्म करने और न्याय का राज स्थापित करने के लिये खुला विद्रोह करने का फैसला किया गया। विद्रोह जब अपने पूरे चरम पर था तो करीब 60 हजार संथाल उससे जुड़े हुए थे। संथालों ने पुलिस स्टेशनों, डाक ढोने वाली गाड़ियों, स्थानीय जमींदारों, महाजनों और अंग्रेजों को निशाना बनाना शुरू किया। अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए सेना का सहारा लिया और क्रूरतापूर्वक दमन किया। करीब 15,000 से ज्यादा संथाल मारे गए। अगस्त 1855 में सीदो को पकड़कर मार डाला गया। कान्हू को 1856 में पकड़ा गया।

1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण कर दिया गया, जिसके लिए 5,500 वर्गमील का क्षेत्र भागलपुर और बीरभूम जिलों में से लिया गया। औपनिवेशिक राज को आशा थी कि संथालों के लिए नया परगना बनाने और उसमें कुछ विशेष कानून लागू करने से संथाल लोग संतुष्ट हो जाएँगे।

 

 

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