मित्रो,

 मुझे इस बात का गर्व है कि किसानी दुनिया के सबसे पुराना पेशा है। किसान के हल से बनी लकीरों ने सभ्यताओं को शुरुआती आकार दिया था। ईतिहास       के तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद  किसान और किसानी आज तक कायम है और आगे भी रहेगी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से किसान बेचैन है। दुनिया का   पेट भरने वाला किसान गरीबी में जीने को अभिशप्त  है। लेकिन निराशा के इस माहौल में कुछ किसान ऐसे भी हैं जो खुशहाल हैं और खूब पैसा कमा रहे हैं। बदहाली और खुशहाली के इस माहौल में निम्न बिंदुओं पर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं।

  1 . टूटता परिवार और छोटी जोत- अIदि काल से खेतों की बंदोबस्ती परिवार नामक संस्था से होती रही है। टूटते परिवार के कारण खेतों की जोत भी छोटी होती गई जिससे खेती की लगत भी बढ़ती गई। हमारा यही प्रयास होना चाहिए की परिवार टूटे नहीं और यदि परिवार में बटवारा हो भी गया है तो खेती मिलकर करें।

  2 . बचत परंपरा- यह उन्मुक्त बाज़ारवाद का ही प्रभाव है की हम बचत की संस्कृति को भूल गए हैं। ज्यादा खर्च करना ज्यादा बड़े होने का पर्याय हो गया है। हमें इस नए मिथक को तोड़कर बचत की पुरानी परंपरा की ओर फिर से लौटना पड़ेगा।

  3 . जैविक खेती-  हम खेती को जीवन का तरीका मानते रहे हैं। हमारा जीवन, भोजन और कृषि सब परम्परागत रूप के जैविक रही है। आज दुनिया भर में जैविक कृषि उत्पादों की जबरदस्त मांग है। आज जैविक कृषि उत्पादों के प्रमाणन की संस्थाएं केवल बड़े शहरों में ही हैं। हम सरकार के साथ मिलकर यह प्रयास करेंगे की प्रमाणन की संस्थाएं ब्लॉक स्तर तक उपलब्ध हों। प्रमाणन संस्थाएं अभी भी आम किसानों की पहुंच के बाहर इसलिए हैं ताकि बड़ी कंपनियों का गोरखधंधा चालू रह सके। हम प्रमाणन संस्थाओं का विकेन्द्रीकरण कर अपने जैविक कृषि उत्पादों को बाजार के माफियाओं से मुक्त कर सकते हैं, ताकि हमें अपने कृषि उत्पादों का ज्यादा से ज्यादा मूल्य सीधे सीधे ही मिल सके।

4 . सरकारी नीतियों और योजनाओं का प्रचार प्रसार- वर्त्तमान में सरकार की कई योजनाएं और नीतियां ऐसी हैं जो किसानों के लिए बहुत लाभकारी हैं परन्तु जानकारी के अभाव में किसान इसका उचित लाभ नहीं ले पा रहे हैं। जैसे सरकार ने गोबर खाद पर 1500 रूपया प्रति टन की सब्सिडी  दे रखी है। ऐसी कई योजनाएं है जिनका ज्यादा से ज्यादा प्रचार प्रसार होना किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा।

5 . सरकार द्वारा उपज की खरीद- अमूमन सरकारी योजनाओं के तहत चलने वाले सरकारी/ मिलिट्री कैंटीन, मिड डे मील अदि में लगभग 60 लाख लोग रोजाना भोजन करते हैं। सरकार अपने स्तर से जल्दी ख़राब होने वाले उपज जैसे आलू, प्याज, टमाटर, सब्ज़ी, संतरा आदि उत्पादों को खरीद सकती है जो इस भोजन का हिस्सा हो सकते हैं। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसी प्रयास के अंतर्गत एक लाख टन आलू खरीदने की घोषणा की है। अन्य कई राज्यों से ऐसी ही योजनाओं को लागू करवाने की बाबत बातचीत चल रही है।  

6 . ई मंडी - आज शहर से लेकर गांव तक अमूमन सभी लोगों को इंटरनेट की उपलब्धता है। हम इस सुविधा को अपने सुख का साधन बना सकते हैं। इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइट हैं जो आपके किसी भी उत्पाद को सीधे सीधे दुनिया भर के ग्राहकों के सामने रखकर बहुत ज्यादा मुनाफा दे सकती हैं। धान, गेहूं, गोबर के उपले (गोइठा) से लेकर ग्रामीण कारीगरों द्वारा बनाई गई बांस की टोकरी और तमाम अन्य चीजें दुनिया के बाजार में बिक सकती हैं। बस जरूरत है थोड़ी सी ट्रेनिंग की और मानसिक रूप से स्वयं को तैयार करने की।

मित्रों भारतीय जनता पार्टी का उद्देश्य अपनी परम्परागत किसानी को नई तकनीक के साथ जोड़कर एक ऐसा माहौल बनाना है जिसमें उत्पादों को बाजार के माफियाओं के नियंत्रण से बाहर लाया जा सके और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले ताकि किसान बदहाली के मौजूदा भँवर से बाहर आ सके।

मित्रों इस पत्र का आशय मात्र इतना है कि आप सभी भारतीय जनता पार्टी  के किसान मोर्चा से जुड़कर किसानों के हित में एक सामूहिक प्रयास का हिस्सा बनें। सरकार और किसानों के बीच किसान मोर्चा को एक पुल का काम करना है। हमारे लिए यह एक बड़ा अवसर है कि केंद्र और कई राज्यों में गरीबो और किसानों के लिए प्रतिबद्ध भाजपा की सरकार है। हम सभी किसान भाइयों को इस सुअवसर का पूरा पूरा लाभ उठाना चाहिए।

आप इस पत्र का जवाब और अपने सुझाव निम्न पते या ईमेल पर भेज सकते हैं। आपके पत्र की प्रतीक्षा रहेगी।

जय जवान , जय किसान ।

 

आपका मित्र

वीरेंद्र सिंह मस्त

राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान मोर्चा

भारतीय जनता पार्टी.

11 , अशोक रोड,

नई दिल्ली,  110001 

 

 

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