मोदी सरकार, किसानो की सरकार

 

किसान आज बहस के केन्द्र में है। देश के सियासी आबोहवा में भी किसानों को लेकर हचलच है। हलचल होनी भी चाहिए, क्योंकि खेती किसानी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कुछ सियासी समूह किसानों की समस्याओं को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन कर रहे लोग स्वामीनाथन आयोग की शिफारिशों की आड़ में केन्द्र सरकार को घेरने में जुटें हैं। इस जुटान में वो सियासी समूह भी शामिल हैं जिनकी सरकार में ही 2006 में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट आई। केन्द्र सरकार का विरोध करने वाले राजनीतिक दल 2014 तक केन्द्र की सत्ता मे रहे। इन आठ सालों में उन्हें किसान आयोग की रिपोर्ट की सुध नही आई। बहरहाल ये उनका कर्म है वो जाने।

किसी भी आयोग की सिफारिशें किसी भी समस्या का स्थाई समाधान नही है। फिर भी स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को ही कसौटी मानकर मा. केन्द्र सरकार के कामकाज को समझते हैं। 2014 में मा. नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनती है। सरकार ने अपना तीन साल पूरा कर लिया। इन तीन सालों में मा.नरेन्द्र मोदी की सरकार स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट की कई सिफारिशों को अमलीजामा पहना चुकी है। उसी में से एक महत्वपूर्ण योजना है प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना।

केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री सिंचाई योजना की शुरूआत की। मा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस योजना के तहत ‘हर खेत को पानी’ का लक्ष्य तय किया। यह काम स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों में से एक है।स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में पुख्ता फसली सुरक्षा एवं बीमा का प्रावधान करने की बात कही गई थी। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अमली जामा पहनाया। एनडीए की सरकार ने किसानों कर्ज के ब्याज दर में 5 फीसदी की कटौती करते हुए उसे 4 फीसदी तक लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। सस्ती दरों पर किसानो को कर्ज मिले यह भी सिफारिश स्वामीनाथन आयोग ने की थी। यह सिलसिला यहीं नही रूकता। स्वामीनाथन की सिफारिशों में मिट्टी की जांच की व्यवस्था करके उसे अत्याधिक उत्पादन के अनुकूल बनाये जाने की बात थी। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सायल हेल्थ कार्ड के जरिए मिट्टी की जांच करके उसकी उपजाऊ क्षमता बनाए रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाया। सभी 648 कृषि विज्ञान केन्द्रों पर सूक्ष्म मृदा जांच प्रयोगशालाएं खोली जाएंगी। इसके अलावा उद्मियों के सहयोग से 1000 प्रयोगशालाएं अलग से खोली जाएंगी। 

स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सड़क के जरिए जुड़ने के लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की बात की है। तीन साल पहले जब नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क निर्माण की गति 73 किलोमीटर प्रतिदिन थी, आज तीन साल बाद 133 किलोमीटर प्रतिदिन है। स्वामीनाथन ने अपनी सिफारिशों में आसान बैंकिंग सुविधाओं और लोन की बात की है। बजट में कृषि श्रृण के लिए 10 लाख का लक्ष्य रखा है।

यही नही नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार ने किसानों के परिवार को सारी सुख सुविधाएं मिले इसका भी ख्याल रखा है। इसीलिए केन्द्र सरकार ने 1.87 लाख रूपए गांवों के विकास के लिए सुनिश्चि किया है। 2018 तक भी गावों के विद्युतीकरण का लक्ष्य रखा है। शायद इसीलिए जिस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर नरेन्द्र मोदी सरकार के विरोधी आंसू बहा रहे हैं, वही एम.एस. स्वामीनाथन नरेन्द्र मोदी सरकार की कृष नीतियों की तारीफ करते हुए ट्वीट करते हैं “मोदी सरकार ने किसान आयोग की अधिकांश सिफारिशों को माना है, जिसमें मृदा स्वास्थ्य कार्ड, उन्नत बीज व्यवस्था आदि लागू करना” 

इन निष्कर्षों के साथ ये तो डंके की चोट पर कहा जा सकता है कि किसान हितैषी है मोदी सरकार।

 

आपका 

राकेश सिंह

राष्ट्रीय प्रवक्ता

भाजपा किसान मोर्चा

11, अशोक रोड, नई दिल्ली

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सूखा- सच का या सोच का..
नरेश सिरोही
9899600011
 
आज सूखे की मार से दस राज्यों के 256 जिले और देश की एक तिहाई आबादी सूखे से ग्रस्त है। कामधेनु की तरह सबका पोषण करने वाली धरती का सीना मोटी-मोटी दरारों से चिरा पड़ा है। सूखे पेड़-पौधे, प्यासे जानवर और पक्षियों का रुदन राग भविष्य के महाविनाश का संकेत दे रहे हैं। किसान अपनी आंखों के सामने कुम्हलाती खेती, मवेशियों की चारा-पानी के लिए तड़पन, अपनी घर-गृहस्थी को उजड़ता देख, निराशा-हताशा में डूब, उस रास्ते की ओर बढ़ चला है, जहां से कोई लौटकर नहीं आता। इन परिस्थितियों का सही-सही विश्लेषण कर, विचार करने की आवश्यकता है, ताकि समझदारी के साथ समाधान खोजने में सही दिशा की ओर बढ़ चलें। 
विश्व के अन्य देशों की तरह अपने देश में भी प्राकृतिक आपदाएं आना कोई नई बात नहीं है। किसी ना किसी क्षेत्र में सूखा-बाढ़, चक्रवात, तूफान, अकाल, महामारी और भूकंप आदि घटनाएं होती रहीं हंै और होती रहेंगी। हर भू-भाग में रहने वाली आबादी ने उन्ही परिस्थितियों में रहने का कौशल विकसित कर लिया था और आज भी कई देश ऐसा कर पाने में सफल हैं। जैसे हर मिनट किसी ना किसी भूकंप की कंपन सहने वाले जापान के क्रांतिकारी भवन डिजाइन, इजराइल में पानी की कमी है, लेकिन सिंचाई के सभी उन्नत टेक्नोलाॅजी के साथ-साथ डेयरी में भी इजराइल काफी ऊपर है। इसके अलावा दुनिया के ठंडे रेगिस्तान में गिने जाने वाले लाहौल-स्पिति में भी वहां के पांरपरिक ज्ञान के कारण ही पानी की उपलब्धता है और फल व सब्जी उत्पादन भी हो रहा है, ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं।  
तीन ओर समुद्र और उत्तर में हिमालय से घिरे इस देश में अनगिनत नदियां, झील, तालाब और मानव निर्मित बड़े-बड़े बांध हैं, लेकिन इन सबके बावजूद देश जल-संकट से जूझ रहा है, यहां विचारणीय बिंदु यह है कि क्या ये स्थितियां अचानक पैदा हुई हैं या फिर इन्हे हमने धीरे-धीरे पैदा किया है। भौतिक समृद्धि पाने की अंधी दौड़ में, हमने सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा कर, जिस तरह की जीवन पद्धति को अपनाया है वह ही जिम्मेवार है। विकास और प्रकृति के बीच सहज सामंजस्य को भुलाकर, विकास के जिस मार्ग को हमने चुना है, क्या वो मार्ग मानव सभ्यता को सुख और समृद्धि की ओर ने जाने में सक्षम है? या महाविनाश की ओर! आज के ‘‘विकास माॅडल‘‘ में प्रकृति के पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, पवन, आकाश और अग्नि को बिना कुपित किए विकास की कल्पना की जा सकती है? या फिर नए सिरे से विकास की अवधारणा पर विचार करना चाहिए।
जिस तरह गरमाती धरती पर जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसे वैज्ञानिक भी सामान्य नहीं मान रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र में दो दशक से अधिक समय काम कर चुके वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि हिमालय में सूखा चक्र की शुरूआत हो चुकी है। भूगर्भ वैज्ञानिकों का कहना है कि 50 वर्ष में हिमालयी क्षेत्र का तापमान और बढ़ेगा, जिससे शुरूआत में बाढ़ आएगी और फिर सूखा बढ़ेगा, अनियमित तेज बारिश होगी। इन बदलावों के चलते ना तो हिमालय में पानी रुकेगा और ना ही ग्लेशियरों के पिघलने से फिर बर्फ जम सकेगी। हिमालय के बाहरी वातावरण और नीचे भूगर्भ में हो रहे बदलाव अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इंडियन प्लेट प्रतिवर्ष दो संेटीमीटर हिमालय के नीचे सरक रही है, जिससे हर वर्ष हिमालय भी ऊंचा उठता जा रहा है। हिमालय अपने संक्रमणकाल से गुजर रहा है। कम से कम पचास हजार साल से अधिक चलने वाले इस चक्र को हिमालय एक बार पहले भी झेल चुका है। इन वैज्ञानिकों की बातें सुन इस देश के नीति-निर्माता जाने-समझे कि उन्हे क्या करना है। इन नीति-निर्माताओं से जो हम समझे उसकी चर्चा भी कर लेते हैं, हरित क्रांति ने गेहंू- धान के भंडार तो जरूर भरे, लेकिन तिलहन-दलहन और मोटे अनाजों की स्थिति क्या है? पारंपरिक फसल चक्र के बदले फसल कुचक्र ने मिट्टी-पानी-बीज और पर्यावरण आदि को किस स्थिति में पहंुचाया है हम सब जानते हैं। इन नीति निर्माताओं ने देश की कृषि को गर्त में और किसान को मौत के मुंह में धकेल दिया है। अभी सूखे की परिस्थिति पर ही चर्चा करें तो ठीक रहेगा। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1951 में भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 5177 घनमीटर थी जो आज घटकर 1650 घनमीटर रह गई है। वर्ष 2050 तक ये आंकड़ा 1447 घनमीटर या उससे भी कम होने की संभावना है।
प्रति व्यक्ति कम जल उपलब्धता का बड़ा कारण बढ़ती आबादी है। देश में प्रति वर्ष बारिश और हिमनदों से 4000 अरब घनमीटर प्राप्त जल में से 2131 अरब घनमीटर यों ही बह जाता है, शेष 1869 में से मात्र 1123 अरब घनमीटर जल को हम सतही उपयोग या धरती के पेट में उतार पाते हैं। बड़े-बड़े बांध और नदी जोड़ने जैसी महत्वाकांक्षी महंगी परियोजनाओं की सोच रखने वाले नीति निर्माताओं की देन है सूखा। इन अदूरदर्शी नीति निर्माताओं के पास न तो टिकाऊ कृषि नीति है ना ही प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की समझ और ना ही जल-प्रबंधन का सहूर। अगर ठीक से प्रबंधन कर लें तो अकेले 86,140 वर्ग किलोमीटर में फैला गंगा बेसिन ही 47 फीसद खेतों और 35 फीसद आबादी की सूखे से मुक्ति में सक्षम है। प्रबंधन की ही बात करें तो दिल्ली में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता करीब 250 लीटर प्रति दिन है, जबकि मैक्सिको में प्रति व्यक्ति प्रति दिन पानी की उपलब्धता लगभग 150 लीटर है और इजराइल में प्रति व्यक्ति प्रति दिन पानी की उपलब्धता करीब 100 लीटर है, फिर भी पानी वहां की मारामारी नहीं है जबकि दिल्ली में पानी के लिए त्राहि-त्राहि है। इजराइल में ये सिर्फ पानी के सही प्रबंधन से ही संभव हुआ है। 
मानकों के अनुसार अगर पानी की उपलब्धता प्रति वर्ष 1000 घनमीटर प्रति व्यक्ति हो तो ठीक माना जाता है। इजराइल में ये आंकड़ा करीब 461 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष का है। यानी तय मानकों से बेहद कम पानी की उपलब्धता होने के बावजूद इजराइल में पानी की कमी नहीं है और भारत 1650 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष पानी की उपलब्धता के बावजूद पानी की समस्या से जूझ रहा है। 
ये कुप्रबंधन का ही नतीजा है कि देश की जहां 40 फीसद आबादी पानी की कमी से जूझ रही है, वहीं दूसरी बड़ी समस्या जल संदूषण की है, जिसे कई लोग जल प्रदूषण भी कह देते हैं। भू-जल हो या गंगा और यमुना जैसी पवित्र अविरल बहती नदियां, भयानक रूप से संदूषण की शिकार हैं। उदाहरण लें तो गंगा नदी के 100 मिलीलीटर जल में 60 हजार मल जीवाणु यानी ईकोलाई बैक्टिरिया पाए गए हैं। देश में लाखों लोगों की मौत जल-जनित रोगों के कारण हो रही है।  
विश्व के करीब ढ़ाई फीसद भू-भाग पर लगभग अट्टारह फीसद आबादी को लेकर रहने वाले भारत के पास समस्त प्रकार की जलवायु क्षेत्र मौजूद है। यहां बर्फ से ढंकी चोटियां...ध्रुव प्रदेश जैसा दृश्य! दक्षिणी प्रायःद्वीप का भूमध्य रेखा के निकट सूर्य भी सीधी किरणों के कारण भीषण गर्मी वाला क्षेत्र भी भारत में है और कभी चेरापूंजी जैसा क्षेत्र 16000 मिलीमीटर बारिश के साथ अधिकतम वार्षिक वर्षापात वाला क्षेत्र है, तो शून्य से 50 मिलीलीटर वर्ष का थार मरूस्थल वाला राजस्थान या लेह, लद््््दाख, करगिल और लाहौल स्पिति के शुष्क क्षेत्र भी यहीं हैं। जहां आसमान से बरसीं एक-एक बूंदों को संजोने की वे पारंपरिक तकनीके, जिनके चलते ये कम वर्षा वाले क्षेत्र भी बेपानी नहीं हुए। अगर, यहां पानी को संजोने की स्थानीय कौशल ना होता, तो यहां आबादी भी ना होती।
देश की प्रभावित आबादी का बड़ा हिस्सा अपने घर और पशुओं को भगवान भरोसे छोड़ पलायन कर गया है। सच तो ये है कि, सरकारें भाग-दौड़ कर के भी पीने का पानी, पशुओं के लिए चारा, जरूरतमंदों को अनाज की व्यवस्था और फसल बर्बाद होने पर रोजगार मुहैया नहीं करा पाईं हैं। लेकिन ये वक्त सूखे से उभरी चुनौतियों से निपटने का है, कोसने का नहीं। हम सबको मिल बैठकर तत्कालिक व दीर्घकालिन योजना पर विचार कर उनको क्रियानवित करने का मार्ग प्रशस्त करना होगा। इसके लिए सरकार की सहभागिता के साथ-साथ जनभागिता भी जरूरी है। स्कूलों के पाठ्यक्रमों मंे बच्चों को बचपन से ही जल संरक्षण, संवर्धन और विवेकपूर्ण उपयोग के पाठ पढ़ाने होंगे, तभी इन आपदाओं से निपटने में हम फिर से सक्षम हो सकेंगे। और इसके लिए संचार माध्यमों को भी कारगर, रचनात्मक भूमिका निभानी होगी।
हरित क्रांति के शुरूआती दौर से चले आ रहे फसल चक्र ने देश के 264 जिलों को डार्कजोन में पहंुचा दिया है। अभी तक औसतन 11 मीटर जल स्तर नीचे गिर चुका है। हमारे यहां भूजल का 70 से 80 फीसदी उपयोग अकेले सिंचाई के लिए होता है। हमें योजनाएं बनाते वक्त भौगोलिक और प्राकृतिक स्थितियों को ध्यान में रखना होगा। हमें मिट्टी, मौसम और उपलब्ध जल के अनुसार  फसल और फसल चक्र का चुनाव करना चाहिए। कम पानी वाले क्षेत्रों में गन्ना और धान जैसी फसलों के बजाए कम पानी में होने वाले मोटे अनाज, दलहन, तिलहन आदि की पैदावार ले सकते हैं। जलवायु परिस्थिति के अनुसार बीजों का चुनाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया में तीन ‘‘आर‘‘ यानी ‘रीड्यूज़, रिसाइकल और रीयूज़‘ की बात कही जा रही है। सही भी है हमें पानी और अन्य संसाधनों के उपभोग में कमी करनी है, फिर उनका पुनःचक्रण करना है, यानी अपशिष्ट जल को उपचारित करके सिंचाई, सफाई या अन्य कार्यों में दोबारा उपयोग करना आदि। इससे शहरी क्षेत्र में 60 फीसद के अधिक जल की खपत कम की जा सकती है। 
भारत का पारंपरिक ज्ञान एक नहीं पांच साल सूखा और अकाल में भी सुख से रहने का गुर जानता था। लेकिन आधुनिकता की चकाचैंध ने जल को सहज कर रखने, बीजों को बचाने और पशुओं की नस्ल सुधार के हुनर को भुला दिया है। सूखे से निपटने में पशुधन की बड़ी भूमिका है। अगर इनके लिए पर्याप्त पानी और चारे का इंतजाम हो तो पशु भी बचेगा और उनके दूध से हमारी सेहत भी बनी रहेगी। बरसात के दिनों में जंगलों और खेतों में घास की और पतझड़ में पत्ते की भरमार होती है। पहले इन्हे सहज कर रखने का चलन था, जो सूखे के दिनों में चारे के रूप में काम आता था। बागवानी भी सूखे के प्रभाव से निपटने में बड़ी भूमिका निभाती है। हुनरमंद हाथों की अहमियत को समझना होगा, सूखे के समय पूरे परिवार को रोजगार तो मिलता ही है, लेकिन उस समय भी सृजनशीलता की उड़ान दुखभरे वक्त को कैसे बिता देती है, इसकी गहराई को समझना होगा। फिर से पारंपरिक ज्ञान की अहमियत को समझना होगा...गांवों में कुटीर धन्धों, हाथों के हुनरमंदों से जीवन जीने के हुनर को सीखना होगा।
हाल ही के दिनों में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में कर्जत के निकट खाडवे गांव जाना हुआ। यहां अशोक गायकर और उनके मित्रों ने मिलकर दोनो ओर पहाड़ों से घिरे साठ एकड़ भूमि पर वनदेवता डेयरी एंव कृषि फार्म विकसित किया है। यहां वर्षा जल संरक्षण के लिए चैकडैम तथा पहाड़ों से बहकर आए जल को एक एकड़ तालाब में एकत्र किया जाता है। यहां पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के उपयोग का अद्भुत संगम देखने को मिला। दस भारतीय नस्लों की 150 गायों का संरक्षण और संवर्धन, दूध के अलावा गोबर-गोमूत्र से बने उत्पाद, गोबर गैस का उपयोग तथा कंपोस्ट खाद आदि द्वारा जैविक कृषि, बकरी पालन, मुर्गीपालन और मत्स्य पालन भी यहां हो रहा है। बेमौसमी फल, फूल, सब्जी आदि पैदा करने के लिए पाॅलीहाऊस तथा सूखे के मौसम में भी हाइड्रोपोनिक्स विधि द्वारा पशुओं के लिए हरे और पौष्टिक चारे का उत्पादन। आम, आंवला, चिकू सहित अन्य बागवानी फसलें हो रही है। खेतों में सिंचाई के लिए बूंद-बूंद या टपक (ड्रिप सिंचाई पद्धति) तकनीक का प्रयोग हो रहा है। यहां प्रधानमंत्री के ‘मोर क्राॅप पर ड्राॅप‘ के नारे को साकार होते देखा जा सकता है। अगर दो साल वर्षा ना भी हो तो यहां 60 एकड़ खेती और 150 गायों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध है। देश के अलग-अलग भागों में उत्तराखंड में उफरेखाल में सच्चिदानंद भारती, बुंदेलखंड में मंगल सिंह, जयपुर के लापोड़िया के लक्ष्मण सिंह, मध्यप्रदेश के आईएएस उमाकांत उमराव जैसे आर्थिक और सामाजिक महाशक्ति के अनेक उदाहरण हैं, जो हमें सूखे में सुख से रहने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। 
आर्थिक महाशक्ति की चाह तभी पूरी होगी, जब आर्थिक स्थिति को गिरने से रोकने के उपायों के साथ-साथ गिरते भूजल के स्तर के उपाय भी हों। जब भू-जल का स्तर गिरता है तो जीवन की गुणवत्ता का स्तर भी गिर जाता है। जल की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा के बीच गहरा संबंध है...और बिन पानी खाद्य सुरक्षा की बात भी बेमानी है। हमें जरूरत है...भारतीय पारंपरिक ज्ञान के अनुभवों के आधार पर शोध और अनुसंधान की छूटी कड़ी को फिर से जोड़, आगे बढ़ने की... 
 
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किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश के सामने एक लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य है वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का। देश में पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने किसानों की समग्र भलाई के लिए इस तरह का कोई लक्ष्य देशवासियों के सामने रखा है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कृषि मंत्रालय को यह काम 2022 तक अंजाम देना है। कृषि मंत्रालय पूरे मनोयोग और ईमानदारी के साथ प्रधानमंत्री के इस सपने को साकार करने में लगा हुआ है। देश के सभी जिलों में 15 अगस्त, 2017 से केवीके के संयोजन में किसानों की आय दुगनी करने के लिए संकल्प सम्मेलनों में बड़ी संख्या में किसान एवं अधिकारी संकल्प भी ले रहे हैं।
2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए कृषि मंत्रालय योजनाबद्ध तरीके से 7 सूत्री कार्य योजना पर काम कर रहा है। पहला सूत्र है उत्पादन में वृद्धि, मोटे तौर पर इसका मतलब है पर्याप्त संसाधन के साथ सिंचाई पर ध्यान केन्द्रित करना। यही वजह है कि सर्वप्रथम हमने सिंचाई में बजटीय आवंटन बढ़ाकर इस पर ध्यान केन्द्रित किया है।
भारत के पास 142 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि है जिसमें से केवल 48 प्रतिशत संस्थागत सिंचाई के तहत है। “हर खेत को पानी” के उद्देश्य के साथ 1 जुलाई 2015 से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत की गयी ताकि सिंचाई आपूर्ति श्रंखला, जल संसाधनों, नेटवर्क वितरण और फार्म लेवल अनुप्रयोगों में सर्वागीण समाधान किया जा सके। हम इसमें समग्र दृष्टिकोण अपना रहे हैं जो सिंचाई और जल संरक्षण को मिलाता है। उद्देश्य “प्रति बूंद अधिक फसल” पाना है। साथ ही, वर्षों से लम्बित मध्यम एवं बड़ी सिंचाई योजनाओं को 4 वर्षों में प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त जल संचयन एवं प्रबंधन के साथ ही वाटर शेड डेवलपमेंट का कार्य भी तेज गति से कार्यन्वित  हो रहा है।
दूसरा सूत्र है इनपुट का प्रभावी उपयोग, जिसका अर्थ है गुणवत्तापूर्ण बीज, रोपण सामग्री, जैविक खेती एवं प्रत्येक खेत को मृदा स्वास्थ्य कार्ड एवं अन्य योजनाओं के माध्यम से उत्पादन में वृद्धि। दूसरे सूत्र में हम श्रेष्ठ बीजों एवं पोषकता पर जोर दे रहे हैं। जैविक खेती के लिए भी पहली बार नयी योजना प्रारंभ की गयी है। इसी प्रकार नीम कोटेड यूरिया के माध्यम से यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता तथा यूरिया का अवैध रुप से रसायनिक उद्योग में दुरुपयोग भी समाप्त हो गया है। साथ ही,सॉयल हेल्थ कार्ड्स के प्रावधान से संतुलित उर्वरकों के उपयोग के कारण किसानों की लागत कम हो रही है एवं उत्पादन में बढ़ोतरी भी हो रही है। इसके अतिरिक्तो कृषि प्रक्षेत्र में नई तकनीक का उपयोग जैसे-कृषि प्रक्षेत्र के लिए स्पेहस टेक्नो लॉजी राष्ट्रीउय कार्यक्रम,किसान कॉल सेंटर, किसान सुविधा एप्पक जैसे दूरसंचार एवं ऑनलाईन माध्य‍मों से किसानों तक समय सूचना एवं एडवाइजरी भी पहुंचाई जा रही है।
तीसरा सूत्र है उपज के बाद नुकसान कम करना, फसलों की उपज के बाद उसका भंडारण करना किसानों के लिए एक बड़ी समस्या है। भंडारण की सुविधा के अभाव में मज़बूरी में कम कीमत पर उपज की बिक्री करनी पड़ती है। इसलिए सरकार का मुख्य ध्यान किसानों को प्रोत्साहित करना है ताकि वे वेयर हाउस का उपयोग कर अपनी फसल को मजबूरी में ना बेचें । प्राप्त जमा रशीद के आधार पर किसानों को बैकों से ऋण मुहैया कराया जा रहा है, एवं  ब्याज में छूट भी दी जा रही है। किसानों को नुक्सान से बचाने के लिए सरकार का पूरा फोकस ग्रामीण भंडारण एवं एकीकृत शीत श्रृंखला (Integrated Cold Chain) पर है।
चौथा सूत्र है गुणवत्ता में वृद्धि, सरकार खाद्य प्रसंस्क रण (food processing) के माध्यम से कृषि में गुणवत्ता को बढ़ावा दे रही है। छह हज़ार करोड़ रुपए के आवंटन (allocation) से प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना की शुरूआत की गई है। इसके तहत एग्रो प्रोसैसिंग क्ल स्ट रों के फार्वर्ड एवं बैकवर्ड लिंकेज पर कार्य करके फूड प्रौसेसिंग क्षमताओं का विकास किया जाएगा जिससे 20 लाख किसानों को लाभ मिलेगा और करीब साढ़े पांच लाख लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। 
पांचवा सूत्र है विपणन (कृषि बाजार) में सुधार, हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मूल्य का बड़ा हिस्सा किसान तक पहुंचे और बिचौलियों की भूमिका न्यूनतम हो। इसके लिए केंद्र सरकार केंद्र सरकार कृषि बाजार में सुधार पर ज़ोर दे रही है। तीन सुधारों के साथ ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार योजना की शुरूआत की गई है जिसमें अभी तक 455 मंडियों को जोड़ा जा चुका हैं । कई मंडियों में ऑनलाइन कृषि बाज़ार ट्रेंडिग भी शुरू हो चुकी है। इसके अतिरिक्तह सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में बाजार सुधार की दिशा में एक मॉडल एपीएमसी एक्ट  राज्योंे को जारी किया गया है जिसमें निजी क्षेत्र में मंडी स्थादपना, प्रत्य क्ष विपणन मंडी यार्ड के बाहर बनाने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्तम संविदा कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार एक मॉडल एक्ट‍ बनाने का कार्य भी कर रही है।  
साथ ही, किसानों को फार्मर प्रोड्यूसर आर्गेनाइजेशन के रूप में संगठित भी किया जा रहा है जिससे उन्हे सिर्फ इकोनोमी ऑफ स्केल मिले बल्कि व्यापारियों के समक्ष उनकी सौदेबाजी शक्ति भी बढ़े।
छठा सूत्र है जोखिम, सुरक्षा एवं सहायता, जिसके लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू की है। यह किसानों की आय का सुरक्षा कवच है। खरीफ़ व रबी फसल में अब तक की सबसे न्यूनतम दर तय की गई है, जो क्रमशः अधिकतम 2 प्रतिशत और 1.5 प्रतिशत है । इसमें खड़ी फसल के साथ-साथ बुवाई से पहले और कटाई के बाद के जोखिमों को भी शामिल किया गया है। इतना ही नहीं, नुकसान के दावों का 25 प्रतिशत भुगतान भी तत्काल ऑनलाइन भुगतान किया जा रहा है। इस योजना में किसानों को फसल नुकसान के त्वशरित भुगतान हेतु उपज के अनुमान के लिए ड्रोन तकनीक तथा फसल कटाई के लिए स्मा र्ट फोन जैसी नई तकनीकों  का उपयोग भी कई राज्यों में प्रारम्भइ किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, किसानों की सुविधा के लिए इस खरीफ मौसम से कस्टमर सर्विस सेंटर एवं बैंक आनलाइन जैसी नई तकनीकी सुविधाओं के माध्यम से प्रीमियम राशि जमा कराने का भी प्रावधान किया गया है।
प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान  के राहत नियमों में भी सरकार ने बदलाव किए हैं। अब केवल 33 प्रतिशत फसल नुकसान होने पर भी सरकार अनुदान दे रही है। साथ ही अनुदान की राशि को 1.5 गुना बढ़ा दिया गया है।
जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव को भी कम करने के लिए अधिक सहनशीलता वाली किस्मों और पशुओँ की प्रजातियों का विकास तथा प्रभावित जिलों के लिए कॉनटिनजेंसी प्लान भी तैयार किए गये हैं।

सातवां और अतिंम सूत्र है सहायक गतिविधियों से अर्थात कृषि के अनुसंगी कार्यकलापों जैसे बागवानी,डेयरी विकास, पोल्ट्री, मधुमक्खीपालन, मत्स्य पालन, श्वेत क्रांति, नीली क्रांति,कृषि वानिकी,एकीकृत फार्मिंग (Integrated Farming) और रूरल बैकयार्ड पोल्ट्री डेवलपमेंट के जरिए किसानों की आमदनी बढ़ाना। हम सहायक गतिविधियों से किसानों की आय में बढोतरी करेंगे।  अंशत: यह मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, पशुपालन, डेयरी विकास एवं मत्स्यपालन के माध्यम से किया जाएगा। हम किसानों को उनकी भूमि के उस हिस्से का उपयोग करने का प्रोत्साहन दे रहे हैं जो जोता हुआ नहीं है, खासकर खेतों के बीच की सीमा वाला हिस्सा जिसका प्रयोग लकड़ी वाले वृक्ष उगाने एवं सौर सेल बनाने में किया जा सकता है। इसे अतिरिक्त बागवानी, कृषि वानिकी एवं समेकित कृषि पर भी विशेष बल दिया जा रहा है।
 

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